प्रकृति और मैं

 

pexels-photo-39811आज दो साल बाद फिर उन रास्तों से गुफ़्तगू कि।
.
अच्छा लगा ये जान कर की वो रास्ते आज भी मुझे भूले नही है।
.
जरा सा मुस्कुराया क्या मैंने वो रास्ते में मिला करते थे जो पेड़, खिलखिला उठे। हवाओं का रुख तो देखने लायक था, आज भी वही तेजी थी उसमे जो दो साल पहले थी। मैंने सोचा क्यू न दो पंक्तिया लिख डालू इनके नाम।
मैंने लिखना अभी शूरू ही किया था की वो हवाएँ, दो साल पहले के भाँति ही मुझसे बाते करने लगी। बड़ा मजा आया उनसे दो चार शब्दों की लड़ाई कर। आज तो बस ऐसा लग रहा था मानो हवाए बस लड़ जाने के मन में थी मुझसे ।
दो मिनटो की लड़ाई के बाद आ गयी कोयल रानी दूर से ही चिल्लाते हुए और बोली,
“जाओ रूठ गया है मन मेरा तुमसे, बाते जो न की थी बरसो से।”
.
मेरी भी क्या मज़ाल थी की मैं एक शब्द भी बोल पाती।
अगले ही पल बोल पडी ये सड़के मुझसे
क्यों भाई, मैडम साहिबा को याद न आई क्या मेरी?
.
.
फिर एक बार हस पड़ी मैं। उनके गुस्से में जो प्यार था मानो जिंदगी भर के लिए काफ़ी हो। पर मई जो ठहरी इंसान, लालच भरा पड़ा था दिल में, रुक गयी उनके साथ गुफ़्तगू करने के लिए।
.
.
आज भी प्यार है उन रास्तो से, उन पेड़ो से, उन सड़को से, उस कोयल से,उन बहती हवाओ से; उनसे बात कर थोडा हँस लेती हूँ और गाने की कुछ धुन गुनगुना चल पड़ती हूँ एक ऐसी जगह पे जहाँ लोग तो मिलते है पर न तो उनके पास समय होता है हाल जानने के लिये मेरा न तो वो ख़ुशी मिलती है उनसे दो शब्दों की लड़ाई कर।
.
.
.
जीवन में आज तक जो भी सीखा हैं, प्रकृति से ही सीखा है,
इंसान तो आज भी सिखाने के नाम पर भी मुँह मोड़ लेते है।
.
.
-A.A.

Advertisements